आकूति


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शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

मधुमेह एक तथ्य यह भी

मधुमेह सुनते ही धीमि मौत का एहसास होने लगता है। हर कोई जिनको थोड़ा सा भी शक होता है, तुरन्त शुगर टेस्ट कराने दौड़ते हैं। जिनको यह रोग ( जो शायद रोग है ही नहीं ) जकड चुका है वो तो जॉंच उपकरन एव दवाओ मे हजारो खर्च करते हैं। लेकिन अपने रहन-सहन,खान-पान पर ध्यान नही देते हैं।
मै यह सब आपको सलाह देने के लिए या आपका इलाज करने के लिये नहीं, अपितु आपको यह बताने के लिये लिख रहा हुँ,कि आयु्र्वेद के एक चिकित्सक के अनुसार मधुमेह कोई बिमारी नहीं है, तथा यह बंशानुगत भी नहीं है।
उनके अनुसार मधुमेह के हर रोगी का दाँतों में पहले पायरिया होता है,उसके बाद पिछे से दुसरा दाँत,अर्थात जिन्हें हम चौहादाँत बोलते हैं वह जरुर सड़ता है। फिर दाँतों से होकर पेनक्रियाज को नुकसान पहुँचाता है। उसके बाद शरीर में शुगर की मात्रा अनियमीत हो जाती है।
अगर आपको भी मधुमेह है तो आप हमें टिप्पनी के माध्यम से यह जरुर बताऐं कि क्या आपका दाँत सड गया है? ताकि मै आपको अपने अगले पोस्ट उपचार भी बताऊँ।

सोमवार, 14 सितंबर 2009

हिन्दी-दिवस की शुभकामनाएँ!

आज हिन्दी-दिवस है, आज के दिन बेचारी हिन्दी सौ सौ आँसू बहा रही होगी, और हम देशवासी पुरे साल में मात्र एक दिन उसे याद कर इतिश्री कर देते हैं। हिदी किसी प्रदेश या देश तक सीमित नहीं रही। भारत से बाहर फीजी, मारीशस, गायना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, अरब, अमीरात, इग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि कई देशों में लोग इसे दैनिक व्यवहार में लाते है। तकनीकी विकास के चलते आज हिदी में एसएमएस, ईमेल आदि सभी सुविधाएं उपलब्ध है। इटरनेट पर भी हिदी का व्यवहार बढ़ा है। हिंदी ने विश्वभाषा का रूप धारण कर लिया है।

हिदी को लेकर एक बात अक्सर कही जाती है कि गैर हिदी भाषी क्षेत्रों विशेषकर दक्षिण भारत में हिदी का विरोध है। यह बात पूर्णत: सही नहीं है। गैर हिदी भाषी प्रदेशों में हिदी का विरोध हुआ तो वह राजनीति प्रेरित था।

और यदि अंग्रेजी ही राजभाषा के काबिल है तो फिर हिदी पखवाड़ा, हिदी सप्ताह और हिंदी दिवस जैसे ढोंग करने की क्या जरूरत है? क्यों मंत्रालयों और विभागों में हिदी अधिकारी नियुक्त कर करोड़ों रुपये बरबाद किए जा रहे है? क्यों हिदी अकादमी, हिदी विश्वविद्यालय खोले जा रहे है? जो भाषा इस देश के काबिल ही नहीं है और जिसमें इस देश की कार्यपालिका, न्याय पालिका और विधायिका काम नहीं कर सकती है, उसके प्रचार-प्रचार के लिए क्यों देश की धन, श्रम और समय नष्ट किया जा रहा है?

भाषा के मुद्दे को और टालने की बजाए, तुरत समाधान किया जाना चाहिए। इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत है और इसका राजनेताओं में अभाव है। इसलिए इनसे अपेक्षा करना बेकार है। जब पूरे देश में आदोलन शुरू हुए, तभी आजादी मिल सकी। आज ऐसे ही देशव्यापी आदोलन की जरूरत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा का मसला, आजादी से कम महत्वपूर्ण नहीं है। हिन्दी-दिवस की शुभकामनाएँ!

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

मुंबई में विश्व राजधानी बनने की कूवत

हम भारतियों को गर्व करने के लिए विदेशीयों द्वरा कभी कभी कोई शगुफा छोड़ दिया जाता है,ताकि हमें भी कभी कभी खुस होने का मौका मिले। इसी कडी़ में........।

शिकागो। देश की मायानगरी यानी मुंबई में 'दुनिया की भावी राजधानी' बनने की क्षमता है। इसलिए अमेरिका की बिजनेस पत्रिका फो‌र्ब्स ने ऐसे शहरों की सूची में भारत की इस आर्थिक राजधानी का नाम भी शुमार किया है। यह सूची पत्रिका की वेबसाइट फो‌र्ब्स डाट काम ने बनाई है। औद्योगिक गतिविधियां बढ़ने, दुनिया के सबसे बड़े सिनेमा उद्योग और बढ़ते मध्यम वर्ग के कारण इसे इन शहरों में शामिल किया गया है। बेंगलूर और हैदराबाद भी इस सूची में शामिल हैं।

दुनिया की उभरती हुई भावी राजधानी में जिन अन्य शहरों ने जगह बनाई है उनमें बीजिंग, कैलगरी, डलास, दुबई, ह्यूस्टन, मास्को, पर्थ, साओ पाउलो और शंघाई शामिल हैं। हालांकि आर्थिक ताकत और संपन्नता के मामले में ये टोक्यो, लंदन, पेरिस, न्यूयार्क, शिकागो, सिंगापुर और हांगकांग जैसे शहरों से अभी भी पीछे हैं। वैसे इनकी बढ़त दर काफी तेज है।

फो‌र्ब्स डाट काम की इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले जोएल कोटकिन ने कहा कि मुंबई की पहचान केवल बढ़ते औद्योगिक आधार के कारण ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री बालीवुड की वजह से भी बनी है। मुंबई में अमीरों और गरीबों के बीच बड़ी खाई है, लेकिन तेजी से बढ़ रहा मध्य वर्ग अर्थव्यवस्था को दोबारा आकार देने में मदद कर रहा है। यहां छोटे वाहन, मोटरसाइकिल और कम कीमत वाले अपार्टमेंट की बिक्री खासी तेजी पर है। उन्होंने कहा कि 'हां, ये तय है कि दुनिया की भावी राजधानी पश्चिमी देशों में न होकर, चीन, रूस और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में होगी।' रिपोर्ट ने मुंबई, बेंगलूर, हैदराबाद, बीजिंग और साओ पाउलो की बढ़त पर हैरानी जताई है। जागरण।

शनिवार, 29 अगस्त 2009

झारखण्ड मे अकाल

सरकार के सौ दिन गुजर गए। चुनाव पूर्व दावे न पूरे होने थे न पूरे हुए। नरेगा मे 12 हजार करोड़ रुपये देने से क्या होना है,होगा वही जो अघिकारी चाहेंगे। वे अपना और अपने मातहतों का हिस्सा निकालने के लिये कितने छिद्र रखते हैं अगर वो देखना हो तो झारखण्ड आकर देखें। यहाँ के एक अधिकारी के झारखण्ड,दिल्ली एवं अन्य ठिकानो में परसों पडे छापों में C.B.I. को करोड़ों रुपये की चल अचल सम्पती मिली। आखीर ये सब आया कहाँ से।
एक बात और समाज के ये दीमक,अपनी चोरी छिपाने के लिये हर वर्ष हजारों टन अनाज वर्षा के जल में सडा कर लाखों टन पचा लेते हैं। मानसून की इस बेरूखी मे भी इनको अनाज सडाने की खातिर पानी मिल ही गया। कम से कम इस अकाल मे तो इनको भूखे गरीबों पर तरस आनी चाहीए थी सरकार भी अपनी आँकडों पर ही ईतिश्री मान लेती है। कम से कम जिम्मेवार पदाधिकारी पर कार्रवाई तो होनी ही चाहिये, लेकीन होता कुछ नहीं। होता ये है,कि अगले वर्ष फिर से वही कहानी दुहराई जाती है और आँकडों पर टीकी सरकार को आँकडे भेज दी जाती है।..... .
झारखण्ड में अभी राष्टपति शासन है,चुनाव भी जल्द होने हैं फिर भी अकाल राहत के नाम पर केवल घोषणाएँ ही की जा रही हैं,उन पर अमल नहीं हो रहा।